Tushar Dhawal

الهندية

Sarabjeet Garcha

الانجليزية

हथेली पर चिड़िया

मेरी हथेली पर 
आ बैठी एक चिड़िया 
चोंच में पतंग लिये 
बादल सने पंखों को खुजाती संकोच में
कहीं से उड़ कर आई है, चहक रही है  
उसकी आंखों में मरे हुए कल की देह पर उगी 
कामिनी है 
उसकी देह पर सूखी चोटों के गहरे निशान हैं 
यूँ आ बैठी है मेरी हथेली पर 
कि जाने कब से भरोसा रहा हो मुझ पर 
जबकि ग़ैर हूँ पूरी तरह से 
मैं असंख्य पिजड़े लिये अपने पिंजड़े में घूमता हूँ 
अपने सींखचों से उंगली बाहर निकाल टटोलता हूँ 
अरसे से सूखी हुई टहनी बादल को छूते ही 
चेतना से झनक कर खिल उठती है 
मोर नाच उठते हैं 
मेरे आदिम जंगल में 
नसों में थकी नदी हहराती हुई उमड़ उठती है
आकुल समुद्र के उफ़ान में 
कब का डूब चुका एक शहर 
सतह के बाहर ऊँघता सिर उठाता है

आ बैठ मेरे कंधे पर

मेरी देह की झरती पलस्तर पर 
लदी है दुनिया 
झुनझुनों सी लटकी ज़िम्मेदारियाँ 
जाँघों से टकरा कर बजती रहती हैं
कोहनी से झरी मिट्टी के भीतर एक दूब उगी है आज ही  
सिली ज़ुबाँ बोलने को तड़प उठी 
जब 
वक़्त आया, शब्द नाकाफ़ी लगे
मैं चलता रहा नक्षत्रों पर उल्काओं के बीच 
चुप रहा 
चुप रहा 
चुप रहा

घुटो मेरी घुमड़ में 
भटको मेरे बियाबाँ में 
गरजो मेरे विस्फोट में

मेरे माथे पर नाच 
चहक मेरी जिव्हा पर 
कुछ ऐसे कि शब्द न उगें 
लकीर न जन्मे रंग न मिलें 
कुछ ऐसे कि असंज्ञ हो संयोग यह 
भाषा का प्राण से.

© Tushar Dhawal (तुषार धवल)
الإنتاج المسموع: Verseville

A BIRD ON MY PALM

A bird has alighted
in the palm of my hand
Clasping a kite in her beak
and scratching her cloud-smeared wings
the dithering thing has come
from somewhere and is twittering
Her eyes enclose the kamini flower
that budded on the body
of a dead yesterday
Her body carries deep scars
from dried-up wounds
She came on and now nestles in my palm
as if she’s had faith in me
from who knows when
whereas I am a sheer stranger
Bearing countless cages
I flit about in my own cage
Thrusting my fingers through the bars
I grope about
Touching a cloud the long-dried bough
rings with consciousness and bursts into bloom
Peacocks break into dance
in my primal forest
The tired river in the veins
rises with a resounding rush
A city long drowned
in the surge of a turbulent ocean
languidly raises its head through the surface

Come perch on my shoulder

The world burdens
the crumbling plaster of my body
Onuses dangling like rattles
keep drumming against the thighs
Just today a grass has grown
in the dust that fell from the elbow
The sewn tongue groaned
with the desire to speak
When the time came
words felt lacking

I kept walking on constellations
amidst comets
and remained quiet
            quiet
quiet

Be muffled in my cluster
Wander in my wilderness
Thunder in my explosion

Dance on my forehead
Twitter on my tongue
            so no words sprout
no line gets born   no colours mingle
such that this union of language and prana
            doesn’t bear a name

Translated by Sarabjeet Garcha